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Wednesday, March 14, 2012

सीमा , तुम्हें सलाम .... !


भोर के अंतिम तारे के आंखे मूंदने से पहले ही
 वह जिंदा कर देती है, आँगन में पड़े अलसाए चूल्हे को
अपनी हड्डियों का ईंधन बनाकर ,उलीचती है ढेर सारा पसीना
तब धधकती है चूल्हे में आग और ठंडी हो पाती है
चार नन्हें मासूमों और दो बूढ़ी ठठरियों के पेट की जलन  ..............

 हमारे सम्पन्न देश के मानचित्र से ओझल
एक फटेहाल गाँव में रहती है सीमा .............
पति के नाम की वैशाखियाँ कभी नहीं पहनी उसने
 नहीं जानती वह सप्तपदी के मंत्रों का अर्थ......
फिर भी परदेश कमाने गए पति की जगह खड़ी है,
बनकर उसके परिवार का आधार.......
बैल की तरह महाजन के खेत में अपना शरीर जोतती
नहीं जानती थकना ,रुकना या रोना .......
जानती है तो बस चलना , बिना रुके , बस चलते रहना.......

हर साल, महाजन की रकम चुकाने आया पति
भले ही नहीं कर पाता काबू ब्याज की जानलेवा अमरबेल को   
लेकिन कर जाता है अपनी मर्दानगी का सुबूत पक्का
  डाल कर उसकी गोद में पीठ से चिपका एक और पेट
तब भी नहीं रुकती सीमा ............
एक दिन के जाये को सास की गोद में लिटा
वह निकल जाती है ,कुछ और रोटियों की तलाश में .......

तेल –साबुन विहीन , चीथरों में लिपटा शरीर ,सूखा चेहरा , रूखे केश
सीमा नहीं जानती शृंगार की भाषा .......
बेमानी है उसके लिए, पेट के अलावा कोई और भूख
लेकिन फिर भी जानती है वह
जब तक गरम गोश्त की महक रहेगी
रात के पिछले पहर बजती रहेगी सांकलें
और वह मुस्कुराएगी छप्पर में खोंसे अपने हँसिये को देखकर ..................

नई रोशनी से दूर , भारी भरकम शब्दों से बने कृत्रिम विमर्शों से दूर
शाम ढले अपने बच्चों को सीने से लिपटाए ,तारों की छाँव में
सुकून की नींद सोती है सीमा ...............
क्योंकि उसे नहीं है भ्रम ,कल का सवेरा लाएगा कोई बड़ा बदलाव
उसे नहीं है इंतज़ार ,एक दिन वह ले पाएगी मुक्ति की सांस
क्योंकि नहीं है उसे बैचनी ,काट दे वह अपने जीवन की बेड़ियाँ ............
वह नहीं जानती समानता के अर्थ, स्वतन्त्रता के मायने .....
इस सारी आपा धापी से परे वह अकेले ही
खींच रही है अपने परिवार की गाड़ी , अपने एक ही पहिये के सहारे ........ !

हमारे सम्पन्न देश के एक फटेहाल गाँव में रह रही सीमा
 अनजाने में ही रच रही है स्त्री- विमर्श की एक सशक्त परिभाषा
बिना बुलंद किए कोई भी नारा , 
बिना थमाए अपने अधिकारों की फेहरिश्त
किसी और के हाथों में......................!
सीमा, तुम्हें मेरा सलाम ......!
क्या तुम दे सकती हो........
 हम तथाकथित स्वतंत्र ,शिक्षित औरतों को
अपनी आधी हिम्मत भी उधार ...............!!??

15 comments:

  1. जिंदा कर देती है आँगन में पड़े अलसाए चूल्हे को

    अपनी हड्डियों का ईंधन बनाकर ,उलीचती है ढेर सारा पसीना

    तब धधकती है चूल्हे में आग और ठंडी हो पाती है

    चार छोटे बच्चों और दो बूढ़े शरीरों के पेट की जलन ..............

    हमारे सम्पन्न देश के इस मानचित्र से ओझल

    एक फटेहाल गाँव में रहती है सीमा .........वाह रश्मि बहुत सुन्दर व भावपूर्ण रचना इन पंक्तियों के माध्यम से एक ग्रामीण स्त्री की सशक्त रुपरेखा खीच दी तुमने ...सही कहा ना जाने ऐसी कई सीमायें अब भी कर्मत्थ जीवन यापन कर रही हैं मैंने स्वयं पहाड़ों के गावों में देखा है मर्द खटिये पर बैठ कर पत्ते खेलते हैं और औरतें जंगलों से लकड़ियाँ काट कर घर का चुल्हा जलाने से लेकर बच्चों को व घरबार संभालती हैं ....!!सच ऐसी सीमाओं को नमन है

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  2. सीमा, तुम्हें मेरा सलाम ......!
    क्या तुम दे सकती हो........
    हम तथाकथित स्वतंत्र ,शिक्षित औरतों को
    अपनी आधी हिम्मत भी उधार ...............!!??
    ईमानदार अभिव्यक्ति . स्त्री- विमर्श की धुरी जब तक 'सीमा' न होगी , तब तक वह अर्थ हीन ही रहेगा.
    (कृपया वर्ड वैरिफिकेशन हटा दीजिए . रोबोटों को भी कुछ कहने का हक है .)

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  3. jee sir ... bahut shukriya..pata nahi yah verification kyon maangta hai cmt se pahle...dekhti hoon....

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  4. सीमा का श्रृंगार उसके अटूट श्रम में निहित है.सीमा ऐसी स्त्रियाँ ही " स्त्री विमर्श " को अर्थ दे सकती हैं.विचार या कथ्य की दृष्टि से सशक्त रचना है.मुझे लगता है तुम्हे गैप्स देने की आदत डाल लेनी चाहिए. इससे कविता अधिक पठनीय हो जाती है.
    कविता बहुत अच्छे नोट पर समाप्त होती है.कविता के निम्न पंक्तियाँ मुझे बहुत पसंद आयीं --- "वह नहीं जानती समानता के अर्थ, स्वतन्त्रता के मायने .....
    इस सारी आपा धापी से परे वह अकेले ही
    खींच रही है अपने परिवार की गाड़ी , अपने एक ही पहिये के सहारे ........ !
    हमारे सम्पन्न देश के एक फटेहाल गाँव में रह रही सीमा
    अनजाने में ही रच रही है स्त्री- विमर्श की एक सशक्त परिभाषा "

    ऐसे ही लिखती रहो, सोचती और पढ़ती रहो. मुझे लगता है कि तुम यह जानती हो कि सोचे और पढ़े बिना कविता ज्यादा अरसे तक नहीं चल पाती.

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  5. अनजाने में ही रच रही है स्त्री- विमर्श की एक सशक्त परिभाषा
    बिना बुलंद किए कोई भी नारा ,
    बिना थमाए अपने अधिकारों की फेहरिश्त
    किसी और के हाथों में......................!
    सीमा, तुम्हें मेरा सलाम ......!
    क्या तुम दे सकती हो........
    हम तथाकथित स्वतंत्र ,शिक्षित औरतों को
    अपनी आधी हिम्मत भी उधार ...............!!??

    बहुत सशक्त कविता ! जब तक स्त्री-विमर्श मे बुनियादी सवाल नहीं जुडते और ऐसी सीमाओं को इससे नहीं जोड़ा जाता ,तब तक इसकी सार्थकता केवल वाग्विलास तक ही सीमित रहेगी ! बहुत बधाई ,इस दिशा मे सोंचने और उसे कविता मे उतारने के लिए !

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  6. कविता नए रास्ते खोलती है. आशुतोष भाई ने एक ज़रूरी बात कही है. स्त्री विमर्श को मध्यवर्ग से बाहर जाना ही होगा. आपको बधाई

    बस एक तकनीकी बात. कविता में जहां डाट लगाना होता है वहाँ तीन बिंदु लगाने का रिवाज़ है (...). संभव हो तो वही प्रयोग करें. साथ ही बीच में पैराग्राफ की तरह ब्रेक देने से भी पठनीयता बढ़ जाती है. आप देख लें...

    एक बार फिर बधाई और शुभकामनाएं

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  7. रश्मि जी सचमुच आप गाँव में पाठक की उंगली पकड़ ले जाती हैं और मिलवाती हैं उस सीमा से जो अपनी असीम ऊर्जा को झोंक देती है उस सब को बचाने में जिनसे उसे प्यार है । वह मुस्कुराएगी छप्पर मे केएचएनसे हसिए को देख कर !प्रतिरोध ! दुखांत ये है की उस सीमा की ओर कोई नहीं देखता । कविता आईने की तरह हमारे सामने प्रस्तुत होती है ।

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  8. रश्मि जी सचमुच आप गाँव में पाठक की उंगली पकड़ ले जाती हैं और मिलवाती हैं उस सीमा से जो अपनी असीम ऊर्जा को झोंक देती है उस सब को बचाने में जिनसे उसे प्यार है । वह मुस्कुराएगी छप्पर मे केएचएनसे हसिए को देख कर !प्रतिरोध ! दुखांत ये है की उस सीमा की ओर कोई नहीं देखता । कविता आईने की तरह हमारे सामने प्रस्तुत होती है ।

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  9. रश्मि ..सीमा का इतना सजीव चरित्र चित्रण न जाने कितनी बार तुम्हारे ब्लॉग पर आ कर पढ़ चुकी हूँ ....टिप्पणी लिखने लायक मनःस्थिति नहीं बना पा रही थी क्योकि इस सीमा को इतने करीब से जानती हूँ जितना खुद को .....आज अस्तित्व के लिए संघर्षरत हर स्त्री का जीवन ही एक स्त्री विमर्श है .....एक बहुत अच्छी कविता की बधाई स्वीकार करो

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  10. कलाकृति के लीए यह जरुरी नही है कि वह लोक शिक्षाका माध्यम भी बने,जीवनके सत्य और सौंदर्य को उजागर करनेमे ही उसकी सार्थकता और संपूर्णता है.
    जीतेन्द्र भारती

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  11. सीमा को मेरा सलाम !नारी शक्‍ति और जिजीविषा की जीती-जागती तस्वीर जिस पर हर नारी को गर्व है।
    अति सुंदर शब्द-चित्र एवं अभिव्यक्‍ति। बधाई रश्मि जी!

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  12. अपनी हड्डियों का ईंधन बनाकर ,उलीचती है ढेर सारा पसीना
    तब धधकती है चूल्हे में आग और ठंडी हो पाती है
    बहुत सशक्त कविता और भाव है....चित्रण अच्छा है.....बधाई

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  13. सीमा के स्वरूप में कोटिश: स्त्री शक्ति प्रतिदिन यही जीवन जीती हैं .. उन सभी के प्रति बस एक ही पंक्ति है ..

    मां तुझे सलाम .. यह कोई भूभाग नहीं है अपितु हाड़ मांस से बनी उस समस्त जननी शक्ति के लिये है जिनसे सारी कायनात है ..

    अद्भुत चरित्र निरूपण एवं सशक्त प्रस्तुतिकरण - बधाई रश्मि जी ..!

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  14. बधाई हो रश्मि. बहुत सुन्दर कविता है.

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  15. Abhivyakti ki takat uske bahar ane ke veg aur shabdon me pratisamvedit peeda ki tadap se mehsus hoti hai aur Rashmi,tumhara lekhan bahut sarthak mukam ki yatra me nikal chuka hai...swayam apna sampadan karne se bhi paogi ki kuchh ankaha jyada keh jaata hai kabhi kabhi. Is urdhwgami yaatra ko zari rakhna hai tumhe kyonki ek aur adhuri yaatra ab tumse hi ummed laga baithi hai.

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