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Thursday, March 01, 2012

सिल्क स्मिता के बहाने !


बहुत देर से देखी डर्टी पिक्चर . वजह बिलकुल साफ़ थी इसका डर्टी होना , बस मौका तलाश रही थी कि कभी बिटिया नहीं हो आस -पास तो देखूं . कई सवाल छोड़ दिए इस फिल्म ने जेहन में . क्या गुनाह है, अगर किसी स्त्री ने खुद संभाल ली अपनी देह की बागडोर ! क्यों इतना हंगामा अगर उसने खुद लिए अपनी देह से जुड़े फैसले ! अगर यही फैसले एक पुरुष लेता है ,जो कि लेता भी आया है सदियों से , तो किसी को कोई तकलीफ नहीं होती , क्योंकि स्त्री की आत्मा की तरह ही उसके शरीर पर भी उसका कोई अधिकार नहीं . पुरुष की मर्ज़ी उसे जैसे चाहे उपभोग करे , स्त्री को सिर्फ उसके आनंद का , उसकी मर्ज़ी का ख्याल रखना है . वह हाड- मांस की बनी हुई इंसान नहीं एक कठपुतली है समाज के लिए जिसको नियंत्रित करने के धागे हमेशा ही समाज के , उसके कर्ता- धर्ता , उसके ' स्वामी ' के हाथ में रहते हैं . इस फिल्म की एक पात्र है ' नायला ' ,जो एक गॉसिप पत्रिका की जर्नलिस्ट है , वह कहती है ;" हमेशा से पुरुषों को देवता बनाने के लिए औरतों को शैतान बनाना ही पड़ता है ". यह एक टिप्पणी बहुत कुछ कह जाती है औरतों के भूत ,वर्तमान और भविष्य के बारे में . इतिहास गवाह है कि अपने फैसलों को जायज ठहराने के लिए हमारे समाज ने सदा से एक औरत को ही शैतान बनाया है , मंथरा , कैकई से लेकर द्रौपदी तक की गाथाएँ चीख -चीख कर पूछती हैं कि क्या अपने फैसलों का बोझ खुद उठाने की हिम्मत नहीं थी , या किसी स्त्री की छाती पर पैर रखकर ही महानता का तमगा लेना था ! सिल्क सरीखे जिस्म भी समाज ही बनता है ,उसे चाहिए ऐसी गठी हुई देह अपने मनोरंजन के लिए और उस पर मज़े की बात यह कि उस देह की कमान भी वह अपने हाथ में ही रखना चाहता है . सिल्क चुभने लगी उस समाज को जो  औरतों को  उड़ते हुए देखने का आदी नहीं थी , जिसके लिए पत्नी , प्रेमिका और रखैल के अलग -अलग मापदंड तय है और जिनसे इंच मात्र हिलने की उम्मीद वह औरतों से नहीं करता. सिल्क ने गलती कर दी ,उसने अपनी देह अपनी मान ली . फिर कैसे जीने देता उसे यह समाज चैन से ! हो सकता है सिल्क का रास्ता गलत हो, लेकिन कौन तय करेगा इसके मापदंड , कितना क्या गलत है, किसके लिए ,किसने लिखे यह नियम ! जवाब शायद पता हैं आप को . पुरूषों की बनायीं इस दुनिया में स्त्री के लिए बहुत कुछ गलत है ,जो उनके खुद के लिए उनका पुरुषत्व है ,उनकी मर्दानगी का सुबूत . फिल्म का हीरो सिल्क से पहले ५०० लड़कियों के साथ' टयूनिंग ' कर चूका होता है ,लेकिन वह गलत नहीं . और माफ़ करेंगे ऐसा सिर्फ फिल्मों में नहीं होता , फ़िल्में तो थोड़े मसाले के साथ हमारे आस -पास का सच ही दिखाती हैं .पाप पुण्य का हिसाब बाद में कर लेंगे ,समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की परताल भी ,अभी बस यही सवाल बैचैन करता है ,क्यों इतना मुश्किल है एक स्त्री के लिए अपनी शर्तों पर जीना ! सिल्क से लेकर परवीन बौबी तक , राखी सावंत से लेकर पूनम पाण्डेय तक और गली में आने वाली उस धोबन तक,( जो अपने शराबी पति को छोड़ आई है लेकिन खुश है, सजती सम्बरती है ),जिसने भी जीना चाहा है अपनी जीवन अपनी शर्तों पर ,उसके लिए इतनी हेय दृष्टि क्यों है समाज की ! क्यों दिया जाता है उसे एक बुरी ,बिगड़ी हुई औरत का दर्ज़ा ? इस समाज के वह सारे  नियम तब कहाँ चले जाते है, जब एक पुरुष की बारी आती है ,समाज चुप रहता है ,उसकी गलतियों पर  , दबे स्वर में शिकायत करता भी है तो यह जोड़ता है साथ में : अरे ,मर्द की जात ही ऐसी होती है , और लो मिल गया लाइसेंस हर गलती का , हर हदें तोड़ने का . वैसे भी समाज का पालनहार , समाज का रक्षक पुरुष ही है तो अपने ही अस्तित्व पर वह क्यों लगाने लगा प्रश्न चिह्न ! अपने खुद के लिखे नियमों की वह क्यों करने लगा खिलाफत !. सीधी सी बात है हजारों- लाखों साल बाद भी जहाँ औरतों का सवाल आता है ,कुछ नहीं बदला बल्कि स्थिति बदतर होती गयी है . औरतों ने जीने की मुहिम छेड़ दी है बिना यह ठीक से परखे कि समाज तो आज भी उसे आले या दीवार पर सजी देवी प्रतिमा की तरह ही देखना चाहता है , जीती -जागती देवी , जिसे जब चाहे वह रौंद दे लेकिन जिसके पास उफ़ तक करने की भी जुबान नहीं हो , फिर वह कैसे झेल पायेगा हाड -मांस की उस औरत को जो अपनी कामना को जुबान देने लगी हो ,अपनी ख्वाहिशें जीने लगी हो . हमारी सभ्यता -संस्कृति को जिन्दा रखने ,उसकी गरिमा को बचाए रखने का सारा दारोमदार बड़ी ही चालाकी से औरतों के कंधे पर डाल दिया गया है इसलिए पुरुष खुद चाहें तो संसद में बैठकर पोर्न देखे ,और हर लड़की के शरीर का एक्स रे कपड़ों के अन्दर से भी लेते रहें , एक पूनम पाण्डेय  ने थोड़े कपडे क्या उतार दिए इनकी शेषनाग के फन पर टिकी कालजयी संस्कृति अब गिरी कि तब गिरी वाली हालत में आ जाती है . अब तो शर्म करो थोडा . सच को कबूलने की हिम्मत लाओ . बहुत बुरी है सिल्क , मल्लिका , पूनम फिर क्यों हिट हैं ये , इसलिए कि तुम्हे इन्हें देखना अच्छा लगता है , अगर यह नहीं दिखाए तो तुम ऐसे हालत पैदा कर ही लोगे ,संस्कृति के ठेकेदारों कि तुम्हारा आनंद का कोटा बदस्तूर चलता रहे . तो बस सीधा सा हिसाब है ,सभी फैसले तुम्हारे ही थे ,जिए तुमने , अब उन्हें भी जीने दो जैसे वह जीना चाहती हैं .उनका जीवन है और उन्हें बेहतर पता है अपना भला -बुरा .वह भी इंसान है और उन्हे भी हक़ है अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने का . समाज की मेंटल कन्डीशनिंग की इंतेहा तो तब हो जाती है जब औरतें खुद जायज ठहराती है, अपने पैरों की बेड़ियों को . एक मित्र जो बहुत ही धार्मिक और घरेलू महिला हैं , समाज के बनाए दायरों में रहने वाली एक अच्छी औरत’, ने सिल्क सरीखों की चर्चा चलने पर कहा  ; “अरे ऐसी औरतें कलंक हैं हमारे समाज पर . मर्द बिचारे भी क्या करें , कब तक बचाएं खुद को . ऐसी औरतों की यही नियति होती है ". मैं एक ठंडी सांस लेकर उन्हे देखती हूँ . जो जिया आज तक ,जो सिखाया गया जन्म से वही तो कह रही हैं , गलत क्या कहा . “ज़ोर से मत हंसो , आराम से चलो , दुपट्टा ठीक से रखो ,पति का घर ही सब कुछ , रसोई की दक्षता सर्वप्रथम है , ऑलराउंडर बनो , पेंटिंग ,सिलाई ,घर सजाने से लेकर गणित के सवालों तक , शाम में दोस्त के घर पार्टी ,भाई साथ जाएगा , दोस्तों के साथ फिल्म ,भले घर की लड़कियां नहीं जाती ,लोग क्या कहेंगे ”, लंबी सूची है , लेकिन हर लड़की गुजरती है इन हिदायतों से ,कभी घर वाले ,कभी आस –परोस , उन्हे बाध्य करते हैं , समझाते  हैं कि देखो यही रास्ता है , नाक की सीध पर चलती रहो ,बिना सवाल उठाए , और  जिन्होने भी रास्ता बदला , उनकी स्थिति या यूं कहें कि दुर्गति वही होती है जो सिल्क की हुई . आज भी आए दिन अखबारों में पढ़ती ही रहती हूँ ,फलां मॉडेल ने आत्म- हत्या कर ली, फलां किशोरी ने खुद को फांसी चढ़ा लिया वगैरह . सिल्क तो 80 के दशक की थी ,आज 21वीं सदी में भी कुछ नहीं बदला . कामसूत्र और खजुराहो के इस देश में आज भी सेक्स शब्द पर बात करना गुनाह है , खासकर महिलाओं का , उन्होने यह लक्ष्मण रेखा पार की नहीं कि उन्हे आज भी बुरी लड़कियों कि फ़ेहरिश्त में डाल दिया जाता है . समझ से परे है यह मानसिकता , सदियों से नगरवधू रखने की परंपरा वाला यह देश , एक पूरी कॉलोनी रेडलाइट एरिया के नाम से बसाने वाला यह देश क्यों नहीं हजम कर पाता सिल्क को या राखी सावंत को जो माद्दा रखती है खुलकर अपने शरीर पर बोलने का , जिन्हे पता है अपने शरीर की कीमत और उसे कैश करने के सारे हुनर भी बखूबी आते हैं उन्हे . बहुत बुरी हैं ये औरतें , चलिये मान लिया , हमारी आदर्श संस्कृति पर धब्बा , तो बंद कर दीजिये इनकी दूकानें. जीने का हक़ छीनने से अच्छा है ,  जीवन नारकीय बनाने  से अच्छा है ,इन्हे पैदा ही मत होने दीजिये . मत देखिये इन्हे , चोरी छुपे भी , मत आहें भरिए अकेले में भी . खुद ही खत्म हो जाएंगी ये बुरी औरतें जो बिगाड़ रही हैं आपको , आपकी सभ्यता , आपकी हजारों वर्षों पुरानी कालजयी संस्कृति को .... !! आपने सैद्धान्तिक तौर पर तो इन्हे देवी बनाए रखा और अंदर ही अंदर इन्हे सिर्फ एक शरीर समझा जो हर  तरह से आपका बोझ उठाती रही सदियों से . अब कुछ चालाक औरतों ने ,जिन्हे समझ में आ गया आपका यह षड्यंत्र और इंकार कर दिया देवी बनने से और खुल कर संभाल ली अपनी देह की कमान तो इतना हँगामा क्यों ...... !! निर्णय लीजिये पहले खुल कर , निकालिए खुद को दुविधा से कि आपको देवी चाहिए या शरीर , या अलग – अलग खांचे ही बनाए रखेंगे आप , सुविधानुसार इस्तेमाल करते रहने के लिए .......... और अपनी दुर्बलता का ठीकरा फोड़ते रहेंगे  इन बुरी औरतों” के सर ही . मुझे पता है मेरा यह लिखना भी आपको फूटी आँख नहीं भाएगा , मैं भी तो औरत हूँ न और आपके हिसाब से आज मैंने भी कर लिया अपनी सीमा का अतिक्रमण , तो बस पिल पड़िए मुझ पर , राखी , सिल्क , ममता शर्मा  या खुशबू पर , और याद दिला दीजिये सबको कि हमारे इस देश में शरीर पर बात करने का हक़ सिर्फ आपका है , सिर्फ आपका ........ और हवा में उछालने शुरू कर दीजिये सभ्यता , संस्कृति , परंपरा , मर्यादा , नैतिकता जैसे बड़े – बड़े शब्द जो आपने गढ़े ही हैं औरतों को नियंत्रण में रखने के लिए ........ 

20 comments:

  1. रश्मि.मुझे बहुत अच्छा लगा लेख पढ़ कर.सधी हुई भाषा में,नियंत्रित शब्दों में सब कहा है,आपने.स्त्री अपनी मर्जी,अपनी भावनाओं,अपने सुख,अपनी देह....किसी को स्थान नहीं दे पाती ....क्यूंकि ऐसा करते ही वो अच्छी स्त्री होने कि परिभाषा से अलग हो जाती है.सारे नियम ..क़ानून ..मर्यादाएं....स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान होनी चाहिए .

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  2. bahut sashakt abhivyakti rashmi ji aur poornatah sach.....vakt aa gayaa hai ki pahle aurten hi ise sahi tareeke se sweekaren ...khud ko samman den ...purush ye kar paate hain kyonki ham hi unhe ye adhikaar yaa choot dete hain .... ham ne agar poori sajgta aur himmat se apne aurat hone ko sweekar kiya ..use samman diya to vo din bhi door nahin jab purush bhi ye karne ko majboor ho jaayenge ...!!

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  3. बहुत अच्छा लिखा है
    बाकी जैसा डॉ निधि जी ने कहा है मेरी तरफ से पूरा कॉपी पेस्ट...

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  4. रश्मि .. !
    मै सबसे पहले यह कहना चाहता हूं कि मैं आंखे नहीं फेर रहा हूं अपितु अपनी बेटियों को एक स्वतंत्र अस्तित्व की ..इंसान के रूप में एक सम्पूर्ण विकसित समाज में देखने का कांक्षी हूं .. आप के आलेख के बहुत सारे फलक हैं जो दिखते तो समेकित है किन्तु वास्तव में उनसे एक एक कर बारी बारी हे निबटा जा सकता है .. कुल मिलाकर स्थिति जटिल है किन्तु इसका समाधान बिल्कुल आसान है .. एक दम जादू भरा और महिलाओं के ही हाथ में ..
    आपके आलेख के कई महत्वपूर्ण पड़ाव है जो इस स्थिति को रेखांकित करते हैं किन्तु इस विषय में चर्चा के लिये आलेख ही हो सकता है .. आप स्वयं ही देखिये कि विरोध का कोई एक स्वर भी नहीं सभी समस्या है मानते हैं .. किन्तु समाधान्पड़ोसी के घर से होगा क्या .. समाज पहले बदलेगा तभी हम अपनी बेटियों को बदलने के लिये कहएंगे क्योंकि हमें तो इसी समाज में रहना है ..

    अरे.. भाई यह मुर्गी पहले अथवा अण्डा वाली स्थिति से कुछ नहीं होने वाला है जिसे यह स्थिति बर्दाश्त नहीं है वही इसे बदल सकता है .. कितने लोगों ने कलर चैनल का सन्नी लियोन के कारण बहिष्कार किया है .. अपितु .. संभवत: मुझे भी इस नकली सदाचारिता पर इतना रोष है कि यह टिप्पणी की सीमारेखाका अतिक्रमण कर सकता है अत: तुम्हारे आलेख के वही बिन्दु प्रस्तुत कर रहा हूं जो समाधान मांगते है
    ".. . समाज की मेंटल कन्डीशनिंग की इंतेहा तो तब हो जाती है जब औरतें खुद जायज ठहराती है, अपने पैरों की बेड़ियों को .
    ..आज 21वीं सदी में भी कुछ नहीं बदला . कामसूत्र और खजुराहो के इस देश में आज भी ‘सेक्स ‘ शब्द पर बात करना गुनाह है ,
    .. सदियों से नगरवधू रखने की परंपरा वाला यह देश , एक पूरी कॉलोनी रेडलाइट एरिया के नाम से बसाने वाला यह देश क्यों नहीं हजम कर पाता सिल्क को या राखी सावंत को जो माद्दा रखती है खुलकर अपने शरीर पर बोलने का , जिन्हे पता है अपने शरीर की कीमत और उसे कैश करने के सारे हुनर..
    .. अब कुछ चालाक औरतों ने ,जिन्हे समझ में आ गया आपका यह षड्यंत्र और इंकार कर दिया देवी बनने से और खुल कर संभाल ली अपनी देह की कमान तो इतना हँगामा क्यों ...... !!
    ....... और हवा में उछालने शुरू कर दीजिये सभ्यता , संस्कृति , परंपरा , मर्यादा , नैतिकता जैसे बड़े – बड़े शब्द जो आपने गढ़े ही हैं औरतों को नियंत्रण में रखने के लिए ........ "

    लिखते रहिये और रोष अको संचित कीजिये .. अभी यह मात्र एक आलेख से समाप्त्य नहीम होना है .. लम्बी लड़ाई है .. और ताली बजाने वाले बहुत दूर तक साथ नहीं चलेंगे ..
    शुभम मंगलम

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  5. रश्मि.....
    सही कहा आपने...इस पिक्चर को देखने के लिए कहने में मुझे भी हिम्मत जुटानी पड़ी क्यूँ कि नाम ही 'डर्टी' है और फिर लाइफ स्टोरी भी किसकी है 'सिल्क स्मिता' की...अपने जमाने की एक बदनाम एक्ट्रेस...लेकिन जिसने भी देखी,इतने एक्सपोज़र के बाद भी अच्छा ही कहा...तारीफ करने वालों में महिलाओं की संख्या ज्यादा थी....और पुरुष चुप...!! पूरी पिक्चर का प्रेजेंटेशन इतना बढ़िया था कि कहीं कोई वल्गर लगा ही नहीं...लेकिन नाम ही काफी था न देखने के लिए...फिर भी सबने देखी....महिलाओं के अन्दर कहीं कोई भावना है अपने पुरुष के प्रति...जो कह नहीं पाती, उन्हें एक सुकून मिला...और पुरुषों ने अपनी आँखें सेंकी और उसके डायलॉग को इंजॉय किया..अब इससे ज्यादा सोंच भी नहीं सकते बेचारे....ज्यादा गहराई में जायेंगे तो घर में बैठी पत्नी से नज़रें मिलाना दूभर हो जायेगा....ऐसे पुरुष घर में तो सती सावित्री और सीता चाहते हैं लेकिन बाहर में 'सिल्क' जैसी ही कोई चाहिए...और आलोचना के लिए भी वही करते हैं लेकिन अपनी नज़रों पर काबू रखना उन्हें नहीं आता....हाँ.! कहीं भाषण देना हो तो घंटों इस विषय पर बोल लेंगे...!! समाज की सारी संस्कृति और संस्कार का ठेका औरतों पर डाल कर ये आराम से किसी भी बदनाम बस्ती में जा सकते हैं,होटल में भी बुला सकते हैं,पोर्न फ़िल्में देख सकते हैं और साथ में सुसंस्कृत,संस्कारी और शरीफ भी बने रह सकते हैं.....! इतना वो करके बाकी सबका जिम्मा औरत पर है...वो चाहे घर की हो या बाहर की.......!! लिखने को तो अपने इर्द-गिर्द ही इतना है कि क्या कहूँ.....!! हाँ ..सब एक तरह के नहीं होते..न औरतें....न पुरुष ही....लेकिन इस विषय में ज्यादातर सभी इसी श्रेणी में आ जाते हैं.....उत्तेजक आइटम सौंग और सीन देखने जायेंगे और दोष.......फिर वही....'सिल्क' जैसी कोई और....!!...

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  6. यह एक बेहतरीन फिल्म है . आप की प्रतिक्रया भी बिलकुल सही है . मैंने क्लास में भी अपने छात्र -छत्राओं से इस फिल्म की चर्चा की है . हमें ये फिल्म अपने वयस्क बच्चों के साथ जरूर देखनी चाहिए और उस पर चर्चा करने चाहिए .

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  7. उस पर तुर्रा यह भी कि जितने भी विवाद होते हैं स्त्री के कारण ही होते हैं ...

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  8. एक साहसी फ़िल्म पर उतनी ही साहसिक टिप्पणी.

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  9. यह प्रुरूष-प्रधान देश है। स्त्री को एक बेटी के रूप में पिता के अधॊन, पत्‍नी के रूप में पति के अधीन और एक माँ के रूप में एक पुत्र के अधीन रहना ही होगा तभी वह संस्कारी है, सम्मानीय है! जय हो मनु और मनु के वंशंजो !
    स्त्री एक इंसान कहाँ है इनकी नज़र में! वह तो संपत्‍ति है अवस्था और स्थिति के अनुसार उसके स्वामी बदल जाते हैं।
    बहुत ही सुंदर और सार्थक लगी थी "डर्टी पिक्‍चर" और उतना ही प्रभावी आपका आलेख।
    बधाई रश्मि जी।

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  10. ठोंकती रहो एक एक करके कील ..इसी तरह . बेबाक अभिव्यक्ति के लिए बधाई ,

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  11. Wonderful!! Three cheers for Rashmi!!!

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  12. Thanks to Giribala for sharing this on FB.
    Very well written, angry post. I like it. We just need to direct the anger in a better way probably, in our daily life struggles i mean.

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  13. 'समस्याएँ' गिनवाने से 'समाधान' नहीं निकलता . संस्कार दाती - प्रथम शिक्षिका औरत ( 'माँ' ) ही होती है. इस दिशा में 'जीजाबाई' बनकर, उसे ही 'ससक्त नींव निर्धारण' कर, पहल करनी होगी.
    इस बात से कतई असहमत नहीं हुआ जा सकता " मर्यादाएं स्त्री- पुरुष , दोनों के लिए सामान होनी चाहिए".
    निर्भीक, प्रभावी एवं वेवाक अभिव्यक्ति हेतु बधाई..

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  14. स्पष्ट सोच ही यह बेबाकी और निर्भीकता प्रदान करती है...हिपोक्रेसी पर प्रहार करती एक दमदार अभिव्यक्ति... बहुत बधाई आपको

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  15. सशक्त अभिव्यक्ति. आपने एक कटु सत्य को शब्द दिए हैं, यद्यपि यह एक आगाज का बिंदु है..एक बिंदु ऐसा भी आता है सच के सफर में जहाँ मानव एक व्यक्ति....अस्तित्व के एक अंग के रूप में पहचान पाता है, नर और नारी के विभेद गौण हो जाते हैं..क्योंकि प्रत्येक नर में एक नारी है और प्रत्येक नारी में एक नर. काश पुरुष प्रधान व्यवस्था इस सच को स्वीकार कर पाती.
    अन्य रचनाओं पर भी सरुचि नज़र डाली, अच्छा लगा पढ़ना. सादर !

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  16. संतुलित, संयमित फिर भी धारदार ...........और यह धार आती है सत्य से ! आदिम युग से चलना आरंभ करें ...........जबसे समाज वर्गों में विभाजित हुआ ,सभ्यता के नाम पर जो नियम बने ,उनका झुकाव सत्ता-पक्ष की ओर रहा ! सत्ताधारी पुरुष वर्ग नियम बनता रहा और बाकी उसकी नक़ल करते रहे ! मुझे लगता है रतिसंबंधों पर प्रतिबंधों के फलस्वरूप जीवन जिस दमन से होकर गुजरा है उसने कई तरह के शारीरिक और मानसिक रोगों को जन्म दिया है , कई हरमोंन संबंधी विकारों ने स्त्री-पुरुषों के संबंधों को भी विकारग्रस्त कर दिया ! सारा प्रणय साहित्य इसी दमन से प्रसूत है ! नौजवान ,किशोर लड़कियों के स्कूल खुलते और छूटते ही पगला जाते हैं ,चीखते चिल्लाते ,तरह-तरह के करतब करते आपस में लड़ते-झगड़ते ,भेस बनाये ...........यानी अपनी ओर ध्यान खींचने की हर जुगत लगाते हुए चक्कर काटने लगते हैं ! दरअसल रतिसंबंधों पर प्रतिबन्ध तो हैं लेकिन हारमोंस के बनने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं ! प्रतिबन्ध लगाने के पहले प्रकृति को नहीं समझा गया ! यही हाल स्त्रियों का है ,कुछ कम है ,फिर भी है !

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  17. जब मैंने इस फिल्म की तारीफ की तो कई लोगों ने सवाल उठाये. मगर सच्चाई से आँख चुराने की 'शराफत' का नक़ाब उतारने वाली ये फिल्म एक ठोस पहल है अपने गिरेबान में झाँक कर दिखाने वाली. मैं तो यही कहूँगा कि यदि सभी को बराबर का हक़ मिले तो कोई सिल्क की नियति क्यों स्वीकार करे...

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  18. एक फिल्म दर्शक की सामाजिक और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति जब अंतर्संताप में प्रकट हो,तो सम्पूर्ण सामाजिक संजाल की व्यर्थता दिखने लगती है. सिल्क स्मिता जाने कैसी कितनी युवतियाँ महत्वाकांक्षी संसार में प्रथम परिचय की वीथी पर कदम रखते चूक जाती हैं जो एक सहज विश्वास का अबूझा पाठ है. दरअसल , यह सम्मुख उपस्थित पुरुष का दायित्व है कि वह उसकी मर्यादा सहेजे.
    कुहासे में जलती आकृतियाँ , धुँधलाती रौशनी में ठिठकी ज़िंदगी और एक कतरे अँधियारे को ढूंढते मर्द--यह सब आदिम ज़माने के खिलाफ विरोध में तने हाथ और कसी मुट्ठियाँ हैं.सिल्क स्मिता अब एक प्रायोगिक शब्द में ढल चुका है, जो अपराजिता स्त्रीत्व का सार्थक अभिव्यक्ति है.सम्पूर्ण बौद्धिक श्रेष्ठियों को उसके उठाये सवालों को ईमानदारी से जबाब देना चाहिये , तभी ऐसी जाने कितनी भटकती सिल्क स्मिताओं को दूसरी दुनिया में तृप्ति मिलेगी और नया जन्म भी...!

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  19. रश्मि आज पुन:तुम्हारा यह लेख पढ़ा ... पहले भी बहुत अच्छा लगा था ...और आज भी ... सवाल उठाने की क्षमता और उन्हें सही दिशा तक ले जा पाना इस आलेख की तीक्ष्णता और प्रवाह को सौ गुना कर देता है ... जिंदगी में उतरे हुए और उसे संजीदगी से सही परिप्रेक्ष्य में देखने वाले लोग ही ऐसे संयत कदमो से चलते है ...

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